त्रिवेंद्र को हरदा का साथ ले डूबा

त्रिवेंद्र को हरदा का साथ ले डूबा

वरना इस सरकार में भी मुख्यमंत्री टीएसआर को ही बनना था।
मुख्यमंत्री रहते हुए त्रिवेंद्र अपनी सरकार से ज्यादा हरीश रावत पर ज्यादा विश्वास करने लग गए थे।
आज जो भाजपा हाई कमान को राज्य का मुख्यमंत्री बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है उसके लिए सबसे बड़े जिमेदार पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ही हैं। अब आप पूछोगे कैसे? तो बताते चलें कि त्रिवेंद्र पर सबसे पहले ये आरोप लगे कि इन्होंने अपने केबिनेट के कई मंत्रियों से बेर भाव रखने शुरू कर दिए और सबसे ज्यादा बेर इनका हरक सिंह रावत और सुबोध उनियाल से दिखा। वहीं ये कांग्रेस से भाजपा में बने विधायक और मंत्रियों से दूरी रख कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत से काफी नजदीकियां रखने लग गए।
अब हरीश रावत तो कभी चाहते ही नहीं थे कि उनकी सरकार गिराने वाले दूसरी पार्टी की सरकार में फलें फूलें, जिससे हरीश ने त्रिवेंद्र से नजदीकियां बनानी शुरू कर दी। इन्हीं नजदीकियों ने त्रिवेंद्र को उनकी कैबिनेट से दूर कर दिया और धीरे धीरे विरोध इतना बढ़ गया कि उनकी खुद की कुर्सी कब खिसक गई, उनको खुद ही पता नहीं चल पाया।
यदि त्रिवेंद्र उस समय यह सावधानी बरत लेते तो न उन्हें तब पद से हटाया जाता और न आज कोई दूसरा मुख्यमंत्री की दौड़ में होता।

 

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